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International Journal of Creative and Open Research in Engineering and Management

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ISSN: 3108-1754 (Online)
Crossref DOI: Available
ISO Certification: 9001:2015
Publication Fee: 599/- INR
Compliance: UGC Journal Norms
License: CC BY 4.0
Peer Review: Double Blind
Volume 02, Issue 05

Published on: May 2026

भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रमाणमीमांसा : अद्वैत वेदान्त के विशेष संदर्भ में

जीतेन्द्र सिंह दांगी ज्योति सोनी

बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल मध्यप्रदेश

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Plagiarism Passed Peer Reviewed Open Access

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Abstract

भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम, समृद्ध और गहन दार्शनिक परंपराओं में से एक है, जिसमें जीवन, जगत, चेतना और सत्य के स्वरूप को समझने का प्रयास विविध दृष्टियों से किया गया है। इस परंपरा की विशेषता यह है कि यहाँ ज्ञान को केवल बौद्धिक सूचना या तार्किक विश्लेषण तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि उसे आत्मानुभूति, अनुभव और जीवन के रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। भारतीय चिंतन में ज्ञान का अंतिम उद्देश्य केवल बाह्य जगत का अध्ययन नहीं, बल्कि आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार है। इस व्यापक ज्ञान परंपरा में “प्रमाणमीमांसा” का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रमाणमीमांसा वह दार्शनिक शाखा है जो यह निर्धारित करती है कि यथार्थ ज्ञान (प्रमा) की प्राप्ति किस प्रकार होती है, उसके साधन क्या हैं, और उस ज्ञान की सत्यता का निर्धारण कैसे किया जाता है। प्रमाण वह साधन है जिसके द्वारा किसी वस्तु का यथार्थ और निश्चित ज्ञान प्राप्त होता है। भारतीय दर्शन के विभिन्न सम्प्रदायों ने प्रमाणों की संख्या और स्वरूप के विषय में भिन्न मत प्रस्तुत किए हैं। न्याय दर्शन सामान्यतः चार प्रमाणों-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द-को स्वीकार करता है, जबकि मीमांसा और वेदान्त परंपरा में अर्थापत्ति और अनुपलब्धि को भी प्रमाणों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है, जिससे षट्‌प्रमाणों की अवधारणा विकसित हुई। इन सभी प्रमाणों का उद्देश्य एक ही है-सत्य और यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति। इस संदर्भ में “अद्वैत वेदान्त” का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। अद्वैत वेदान्त भारतीय ज्ञान परंपरा की वह दार्शनिक प्रणाली है, जो यह प्रतिपादित करती है कि अंतिम सत्य केवल ब्रह्म है और जीव तथा ब्रह्म में कोई वास्तविक भेद नहीं है। यह सिद्धान्त उपनिषदों के महावाक्यों जैसे- प्रज्ञानं ब्रह्म, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म पर आधारित है। अद्वैत वेदान्त के अनुसार यह अद्वितीय सत्य केवल तर्क या इन्द्रिय अनुभव से प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि ब्रह्म इन्द्रियातीत, तर्कातीत और अनिर्वचनीय है। जिसका मूल उद्देश्य ब्रह्मज्ञान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति है। अद्वैत वेदान्त का केंद्रीय सिद्धान्त “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः” इस बात को स्पष्ट करता है कि अंतिम सत्य केवल ब्रह्म है और जीव उस ब्रह्म से भिन्न नहीं है। इस सत्य की अनुभूति केवल बौद्धिक तर्क से नहीं, बल्कि यथार्थ ज्ञान के माध्यम से होती है, जिसके लिए प्रमाणमीमांसा अनिवार्य हो जाती है। अद्वैत वेदान्त सामान्यतः षट्‌प्रमाण—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि और शब्द—को स्वीकार करता है। इनमें प्रत्येक प्रमाण का अपना विशिष्ट क्षेत्र और सीमा है। उदाहरणतः प्रत्यक्ष केवल इन्द्रियजन्य ज्ञान प्रदान करता है, अनुमान तर्क पर आधारित होता है, जबकि शब्द प्रमाण श्रुति पर आधारित होता है।

शब्द कुंजी -  प्रमाणमीमांसा, प्रमा, प्रज्ञानं ब्रह्म, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म।

How to Cite this Paper

दांगी, जीतेन्द्र, and ज्योति सोनी. "भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रमाणमीमांसा : अद्वैत वेदान्त के विशेष संदर्भ में." International Journal of Creative and Open Research in Engineering and Management, vol. 02, no. 05, 2026, pp. . doi:https://doi.org/10.55041/ijcope.v2i5.848.

दांगी, जीतेन्द्र, and ज्योति सोनी. "भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रमाणमीमांसा : अद्वैत वेदान्त के विशेष संदर्भ में." International Journal of Creative and Open Research in Engineering and Management 02, no. 05 (2026). https://doi.org/https://doi.org/10.55041/ijcope.v2i5.848.

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References


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  • Published on: May 31 2026
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