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International Journal of Creative and Open Research in Engineering and Management

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ISSN: 3108-1754 (Online)
Crossref DOI: Available
ISO Certification: 9001:2015
Publication Fee: 599/- INR
Compliance: UGC Journal Norms
License: CC BY 4.0
Peer Review: Double Blind
Volume 02, Issue 9

Published on: September 2026

अभिराजयशोभूषणम् में आधुनिक संवेदना और शास्त्रीय अनुशासन का समन्वय

Gowrav Tripati गौरव त्रिपाठी

प्रो. (डॉ.) वंदना द्विवेदी

शोधार्थी
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर

 

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Abstract

संस्कृत साहित्य की जीवित परम्परा का मूल वैशिष्ट्य यह है कि उसने परिवर्तन को स्वीकार करते हुए भी अपने शास्त्रीय आधार को सर्वथा विस्मृत नहीं किया। आधुनिक संस्कृत साहित्य में सामाजिक जीवन, राजनीतिक विडम्बना, व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, लोकजीवन, नवीन गीत-विधाओं, ग़ज़ल तथा छन्दोमुक्त कविता जैसी प्रवृत्तियों के विकास ने काव्यशास्त्र के समक्ष यह प्रश्न उपस्थित किया कि नवीन साहित्य को केवल प्राचीन प्रतिमानों से किस सीमा तक समझा जा सकता है। आचार्य अभिराज राजेन्द्र मिश्र विरचित अभिराजयशोभूषणम् इस प्रश्न का एक महत्त्वपूर्ण उत्तर प्रस्तुत करता है। सन् 2006 में प्रकाशित यह ग्रन्थ परिचयोन्मेष, शरीरतत्त्वोन्मेष, आत्मतत्त्वोन्मेष, निर्मितितत्त्वोन्मेष और प्रकीर्णतत्त्वोन्मेष में विन्यस्त है तथा काव्यलक्षण, रस, ध्वनि, दोष, गुण, रीति और अलंकार जैसी परम्परागत अवधारणाओं के साथ नवीन साहित्यिक रूपों का भी शास्त्रीय अनुशीलन करता है।¹ इसीलिए दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी इसे आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र का ऐसा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना है जिसमें विभिन्न काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।²

प्रस्तुत शोध-पत्र में अभिराजयशोभूषणम् के इसी द्वैध वैशिष्ट्य—आधुनिक संवेदना और शास्त्रीय अनुशासन—का समीक्षात्मक अध्ययन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि अभिराज आधुनिकता को शास्त्र-विरोध के रूप में स्वीकार नहीं करते, वे नवीन साहित्यिक अनुभवों के अनुरूप शास्त्र की व्याख्यात्मक सीमा का विस्तार करते हैं। छन्दोमुक्त काव्य, गलज्जलिका, आधुनिक गीत एवं लोकगीतों के लक्षण-निर्धारण में उनकी दृष्टि नवीन है, किन्तु लय, रचना-विधान, रसात्मकता, औचित्य और काव्यत्व की कसौटियों के प्रति उनका आग्रह शास्त्रीय अनुशासन से सम्बद्ध है। अतः अभिराजयशोभूषणम् को परम्परा और आधुनिकता के संघर्ष का नहीं, बल्कि उनके सर्जनात्मक संवाद और समन्वय का ग्रन्थ कहा जा सकता है।

कूटशब्द : अभिराजयशोभूषणम्, अभिराज राजेन्द्र मिश्र, आधुनिक संवेदना, शास्त्रीय अनुशासन, आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र, छन्दोमुक्त काव्य, गलज्जलिका, लोकगीत, रस, अलंकार।

How to Cite this Paper

Tripati, Gowrav, and गौरव त्रिपाठी. "अभिराजयशोभूषणम् में आधुनिक संवेदना और शास्त्रीय अनुशासन का समन्वय." International Journal of Creative and Open Research in Engineering and Management, vol. 02, no. 9, 2026, pp. 1-9. doi:https://doi.org/10.55041/ijcope.v2i9.049.

Tripati, Gowrav, and गौरव त्रिपाठी. "अभिराजयशोभूषणम् में आधुनिक संवेदना और शास्त्रीय अनुशासन का समन्वय." International Journal of Creative and Open Research in Engineering and Management 02, no. 9 (2026): 1-9. https://doi.org/https://doi.org/10.55041/ijcope.v2i9.049.

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References


  1. मिश्र, अभिराज राजेन्द्र. अभिराजयशोभूषणम्. इलाहाबाद : वैजयन्त प्रकाशन, 2006।

  2. मिश्र, अभिराज राजेन्द्र. संस्कृत का अर्वाचीन समीक्षात्मक काव्यशास्त्र. वाराणसी : विश्वविद्यालय प्रकाशन।

  3. भरतमुनि. नाट्यशास्त्र

  4. भामह. काव्यालंकार

  5. दण्डी. काव्यादर्श

  6. वामन. काव्यालंकारसूत्रवृत्ति

  7. आनन्दवर्धन. ध्वन्यालोक

  8. अभिनवगुप्त. ध्वन्यालोकलोचन

  9. कुन्तक. वक्रोक्तिजीवितम्

  10. क्षेमेन्द्र. औचित्यविचारचर्चा

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  • Published on: Sep 07 2026
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